सम्प्रदाय-परिचय श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय :- वैष्णव चतु:सम्प्रदाय में श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय अत्यन्त प्राचीन अनादि वैदिक सत्सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के आद्याचार्य श्रीसुदर्शनचक्रावतार जगद्गुरु श्रीभगवन्निम्बार्काचार्य है । आपकी सम्प्रदाय परम्परा चौबीस अवतारों में श्रीहंसावतार से प्रारम्भ होती है...... युगालोपासना भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य के अनुसार ‘रस‘ या आनन्द ब्र का ही पर्याय है, जो श्रुति द्वारा ‘रसो वै स:‘ के रूप में प्रतिपादित किया गया है। श्रीनिम्बार्क ने अपने भाष्य में ‘रस-तत्व‘ या परमात्मतत्व के अखण्ड आनन्दमयता की स्पष्ट घोषणा की हैं। उनकी मान्यता के अनुसार इस आनन्दमयता का सम्बन्ध......... दीक्षा-स्वरुप दीक्षा से दिव्य भाव की प्राप्ति होती है। दीक्षा से समस्त पापों का क्षय हो जाता है। अतएव इसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा का प्रभाव दीक्षा के बाद ही छलहीन दीक्षित को स्वयं प्रतीत होता है। एक अनिर्वचनीय अन्तस्तोष होता है, दीक्षा से। अवय ही सभी सम्प्रदायों में ही दीक्षा का आाय उज्ज्वल होता है.......... द्वैताद्वैत सिद्धान्त भगवान्‌ श्रीनिम्बार्काचार्य का दार्शनिक सिद्धान्त स्वाभाविक द्वैताद्वैत अथवा भेदाभेद के नाम से प्रसिद्ध है। श्रीवेदव्यास प्रणीत ब्रसूत्र के भाष्यों में विभिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अपने दार्शनिक मतों का प्रतिपादन किया है| इस सभी मतवादों में श्रीनिम्बार्काचार्य का द्वैताद्वैत मत अन्यतम है........

आचार्यश्री एवं युवाचार्यश्री